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सूर्य माहात्म्य - नौवां अध्याय सूर्य माहात्म्य में कलि का वर्णन

Surya Mahatmya - Ninth Chapter Description of Kali in the Sun's glory

 
अचला सप्तमी रथ सप्तमी सूर्यरथ सप्तमी आरोग्य सप्तमी सौर सप्तमी अर्क सप्तमीऔर भानुसप्तमी
 
आलेख © कॉपीराइट - साधक प्रभात (Sadhak Prabhat)

सूर्य माहात्म्य - नौवां अध्याय सूर्य माहात्म्य में कलि का वर्णन

श्रीमहापुराण सूर्य माहात्म्य की रचन गोस्वामी तुलसी दास जी ने की है। इसमें कुल बारह अध्याय हैं।

नौवां अध्याय सूर्य माहात्म्य में कलि का वर्णन

चौपाई

जो नर धरै सूर्य पर ध्याना ।
ताके होइ पुत्र कल्याना॥

जो रवि कथा सुनै मन लाई ।
तापर दिनकर होइ सहाई॥

धर्म प्रताप आदित बलवाना ।
तेज प्रताप है अग्नि समाना॥

हे गिरिजा सुनु शैलकुमारी ।
कहिहौं भानु चरित विस्तारी॥

कहन लगे शिव कथा रसाला ।
जेहि विधि दक्षिण उगहिं कृपाला॥

वर्णन करहिं अर्थ समुझाई।
सुमहु सत्य गिरिजा मन लाई॥

दक्षिण दिशि एक नगर अनूपा।
जलमय विप्र तहाँ कर भूपा ॥

हर्षित भजन करै दिन राती।
तहाँ करै प्रभु सुख बहुँ भाँती॥

यहि विधि प्रभुकी ज्योति विराजे ।
अनहद नाद घट धुनि बाजे॥

तेंतिस कोटि देवता जहँवाँ ।
श्री सूर्य के आश्रम तहँवाँ॥

दक्षिण दिशि काशी परियागा।
तहँ के लोग सकल बड़भागा॥

दो बलभद्र सहोदर संगा।
तहाँ बहें सरितावर गङ्गा ॥

कृपासिन्धु प्रभु परम अगाधा ।
निशिदिन सुमिरतनाथ अबाधा॥

दोहा

दक्षिण दिशा पुनीत है, सुनहु उमा मनलाय ।
सुभग अर्थ जैसे अहै, तैसे कहों बुझाय ॥

चौपाई

कलि व्यतीत जबहीं ह्वै जैहैं।
मानुप को मानुष धरि खैं हैं ॥

तब प्रभु धरि अवतार कलंकी ।
मानुष तन हो जैहैं तंखी ॥

तब दक्षिण दिशि उदय कराहीं ।
आगिल अर्थ कहौं तुम पाहीं ॥

धर्म कथा गइहैं दिन राती ।
नेम धर्म करि हैं बहु भाँती ॥

विप्र जेंवाय के होम करावै ।
वाहि भस्म लै अंग लगावै ॥

यहि प्रति कमला करहिं निवासा।
धर्म कथा कर होइ प्रकाशा ॥

मिथ्या बचन कोय ना भाषै।
घम विचार भानु तप राखै ॥

दोहा

द्वादश कला उगहिं तब, आदि अंत तब आय ।
पूर्वजन्मके सकल अघ, कहत सुनत क्षयजाय॥

॥ इति श्रीमहापुराणे सूर्यमाहात्म्ये कलिवर्णनो नाम नवमोऽध्यायः ॥9॥

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